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اى دو عالم بیک امر از تو تمام
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کاینات از توبه تنسیق و نظام
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هر چه برخاست از این تسع بساط
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و آنچه پیداست از این هفت رباط
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همه از جود تو دارند وجود
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پیش ذاتت برکوع و بسجود
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چون به هستى ز تو در آثاریم
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چشم بر لطف عمیمت داریم
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نزد اهل خرد و اهل عیان
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حرف جیم و عدد اوست چو جان
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1250
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یعنى اسماء حروف ار نبود
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سر دعوات، مقرر نشود
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اثر اسم بهر اندازه
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گر بخوانند بهر آوازه
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هیچ شک نیست که در اسرع حال
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باجابت برسد بىاهمال
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گنج اسرار الهى حرف است
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گوهر مخزن شاهى حرف است
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سى و شش حرف که در گفت و شنید
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کس بپایان رمورش نرسید
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اثرش نامتناهى بدوام
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منتفع زو چه خواص و چه عوام
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شارع عالم خاص جبروت
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فاتح عالم ملک لاهوت
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سر ناسوت از آن در خطر است
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جان ملکوت از آن در حذر است
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نطق هر ذره از آن در قال است
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داند آن هر که ز اهل حال است
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هر چه پیداست در این دیر دو راه
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نیست بىجلوه اسماء اللّه
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بس اثرهاست در این عالم خاک
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که کنند اهل معانى ادراک
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1260
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اسم اعظم که نهان از نظر است
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عقلها جمله از آن بىخبر است
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الف و یک نام که دارد دادار
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هر یکى فائدهیى را در کار
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یک از آن داشت یکى پیغمبر
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پدر مادر موسى از بر
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مادر موسى عمران چون زاد
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پدر آن نام بدختر بنهاد
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لیک میداشت نهان از همه کس
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پدرش بود از آن واقف و بس
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تا بفرمان خداوند جهان
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یافت عمران شرف وصلت آن
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شد از آن اسم مقدس آگاه
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که بود اعظم اسماء اللّه
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گفت یا رب بصفات این اسم
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بحق حرمت ذات این اسم
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که مرا ده پسرى با مقدار
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صاحب معرفت و علم و وقار
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نبى مرسل خود ساز او را
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در همه باب تو بنواز او را
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1270
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داد او را پسرى رب جلیل
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که زد او جامه فرعون به نیل
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نوح از برکت این اسم و صفات «2»
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یافت از مهلکه آب نجات
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موسى از پرتو این اسم به طور
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یافت گفتار تجلى با نور
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عیسى این اسم چو بر خواند، اموات
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یافتند از اثر اسم حیات
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هر چه در عالم، از این اسم بپاست
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زانکه این اسم کنوز الاسماست
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این در از نه صدف اسرار است
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بىبدل چون گهر شهسوار است
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وه چه اسم است که بسیار کسى
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نیستش بر سر این دسترسى
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خاصیتهاش ندارد پایان
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عارفانند بآن دانایان
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وضع آفاق ز نیک و بد حال
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زان توان یافت بسنج اجمال
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1280
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سم خاصى استکه اسرار جهان
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هست در کنز حروفش پنهان
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کس چه داند که چه اسرارست این
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خاصه زمره ابرار است این
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لفظ این اسم چو تکرار کنى
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چون به آداب و عدد کار کنى
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قفل هر کار گشائى بمراد
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گردى از فیض مداما دلشاد
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چهارده نفع رساند این اسم
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اولین آنکه گشائى تو طلسم «3»
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دشمنت نیست شود چون سیماب
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بند گردد بدمیدن سیلاب
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گر بخوانى ز سر صدق و یقین
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کشف گردد همه گنج زمین
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جنیان با تو مصاحب گردند
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اولیاء جمله بتو پیوندند
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جمله خلق سر افکنده تو
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قیصر روم شود بنده تو
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همه خلق مطیعت گردد
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کیمیا نیز نصیبت گردد
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1290
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هیچ علمى بتو مشکل نشود
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یکزمان حق ز تو غافل نشود
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متصل با لب خندان دل شاد
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دین و دنیاى تو گردد آباد
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لیک هر کس بطریقى دیگر
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دارد از حالت این اسم خبر
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سر اسماء حروفش بتمام
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نتوان گفت مبادا که عوام
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مطلع گشته بدان کار کنند
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خلق را بیهده آزار کنند
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امر خاصان نتوان گفت بعام
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تا نیابد اثرش جاهل خام
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باشد از حسن عمل اهل کمال
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چو بیابند از این اسم مجال
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نروند از پى انصاف بدر
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وز بدىها بنمایند حذر
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در عمل عزم بدىها نکنند
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فکر در باب ایذا نکنند
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هر کسى داده از این اسم نشان
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بطریقى که بر او گشته عیان
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بوخوا گفت حق اندر تورات
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در صحف خواند خدایش بخوات
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حنه در سوره انجیل بخوان
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بحقیقت که هم اینست و هم آن
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1300
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خوانده طیوم دیگر یک قیوم
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مغربى گفت که هست او هیوم
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هست مشهور عرب بر جانه
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عجمى گفت ورا بر خانه
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دیلمى کرد رقم کافلنا
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باز جمعى دگرش راحلنا
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نجیه قوم دگر جاهرشا
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هست بو خانه دگر طاهرشا
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در احادیث و روایات و خبر
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هر یکى راست طریقى دیگر
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گر چه این اسم بسى مشهور است
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لیک اینجا نه چنین منظور است
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سال هفتاد و یک عمرم چو رسید
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فکرتم پرده از این رمز کشید
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از ذخایر که کنون الاسماست
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بنده این اسم بر آوردم راست
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بهر آسانى ارباب طلب
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کردم اینکار بقانون ادب
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1310
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خواستم تا که در این علم بکام
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بنهم بر قدم مردان گام
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للّه الحمد که توفیق احد
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داد از این هنرم فیض مدد
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من در این علم بسى بردم رنج
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تا طلسمات گشوم زین گنج
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سر این گنج گهر بگشودم
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گوهرش بین که عیان بنمودم
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گوهر از کان عمل بنمودم
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پرده از چهره او بگشودم
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مزد مردى که از این معدن خاص
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گوهرش را چو بیابد بخواص
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عمل خیر به بنیاد کند
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از (بهائى) بدعا یاد کند
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غرض اینست که ارباب طلب
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نبرند از پى مقصود تعب
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این قواعد چو سراسر خوانند
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بهر ما فاتحهیى بر خوانند
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1320
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چون از این اسم بیابند اثر
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نروند از ره انصاف بدر
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ایکه خواهى بودت عقل و عمل
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تا شود مشکل از این علمت حل
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گوش جان باز کن و دیده دل
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تا کنم بهر تو حل این مشکل
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گر ترا میل بتقریر من است
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بر گشا گوش که وقت سخن است
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سخنم گوهر گوش دل کن
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گوهر گوش خرد حاصل کن
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اگر از علم ولى اللهى
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بىتعلم سبقى میخواهى
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بهر طلاب از این نسخه ژرف
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کاملان راست در او چند شگرف
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من از این طایفه دارم سبقى
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خواندهام در بر ایشان ورقى
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در رموزات که فکرم جلى است
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از عطاهاى نبى و ولى است
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هست در مصحف ما بعد سه میم
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در میانهاى سور در حامیم
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1330
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عددش با سور قرآنى
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متساوى است اگر میدانى
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هشت حرف است بترتیب و نظام
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بسط حرفیش چهل گشته تمام
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نقطهاش نوزده از روى جمل
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هست چون مدخل باسط بعمل
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اولش «3» میم و چهارم لام است
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سیمش شهره در این ایام است
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طا بود آخر شش حرف در او
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گوش دل باز کنى گر نیکو
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در سه جا مصدر اسمش دال است
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در سر آیهیى از انفال است
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اولش هفده آخر سین است
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متصل در وسط یاسین است
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قلب او باعث خوشحالیهاست
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فتح و نصبش همگى نور و ضیاست
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شامل کلى او دار حروف
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جامع علت آثار حروف
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عدد بینهاش هفتاد است
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این هم از قاعده استاد است
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خوانم آن دل که بیابد این رمز
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نکته فاش رموزات بغمز
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1340
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اى (بهائى) چو تو این کشف رموز
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کردى و یافتى آن نقد کنوز
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بیش از این کاشف این راز مباش
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راز پنهان کن و غماز مباش
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هر که اهلیت این حالش است
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بدعا حاصل از این قالش هست
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دم فرو بند که نا اهل شریر
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نشود زین روش خاص خبیر
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من به توفیق خداوند غفور
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طالبان را بنمودم دستور
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اصل و فرعش بنمودم به رموز
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فاش کردم بهمه نقد کنوز
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به (بهائى) همه از صدق و صفا
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بکنند از سر اخلاص دعا
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از مولانا شیخنا البهائى عطر الله مرقده و نور مضجعه
کلیات اشعار و آثار فارسى شیخ بهائى، متن، ص: 101