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تا کى بتمناى وصال تو بگانه
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اشکم شود از هر مژه چون سیل روانه
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خواهد بسر آید شب هجران تو یا نه؟
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اى تیر غمت را دل عشاق نشانه
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جمعى بتو مشغول و تو غایب ز میانه
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رفتم بدر صومعهى عابد و زاهد
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دیدم همه را پیش رخت راکع و ساجد
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در میکده رهبانم و در صومعه عابد
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گه معتکف دیرم و گه ساکن مسجد
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یعنى که ترا میطلبم خانه بخانه
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روزیکه برفتند حریفان پى هر کار
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زاهد سوى مسجد شد و من جانب خمار
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من یار طلب کردم و او جلوهگه یار
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حاجى بره کعبه و من طالب دیدار
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او خانه همى جوید و من صاحب خانه
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هر در که زنم صاحب آن خانه توئى تو!
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هر جا که روم پرتو کاشانه توئى تو!
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در میکده و دیر که جانانه توئى تو!
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مقصود من از کعبه و بتخانه توئى تو!
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مقصود توئى، کعبه و بتخانه بهانه
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بلبل بچمن زان گل رخسار نشان دید
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پروانه در آتش شد و اسرار عیان دید
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عارف صفت روى تو در پیر و جوان دید
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یعنى همه جا عکس رخ یار توان دید
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دیوانه منم، من! که روم خانه بخانه
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عاقل بقوانین خرد راه تو پوید
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دیوانه برون از همه آئین تو جوید
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تا غنچه بشکفتهى این باغ که بوید
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هر کس بزبانى صفت حمد تو گوید
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بلبل بغزل خوانى و قمرى بترانه
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بیچاره بهائى که دلش زار غم تست
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هر چند که عاصیست ز خیل خدم تست
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امید وى از عاطفت دمبدم تست
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تقصیر (خیالى) بامید کرم تست
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یعنى که گنه را به از این نیست بهانه
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کلیات اشعار و آثار فارسى شیخ بهائى، متن، ص: 77